International Journal of Advanced Education and Research

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Vol. 3, Issue 3 (2018)

वर्तमान परिप्रेक्ष्य में गुटनिरपेक्षता का औचित्य


डाॅ0 संध्या जायसवाल, चन्द्रकिरण साहू

प्रस्तुत शोध मुख्य रूप से गुटनिरपेक्षता, गुटनिरपेक्ष आंदोलन उसका बदलता स्वरूप एंव वर्तमान प्रांसगिकता से संबन्ध रखता है। इस क्रम में यह कहा जा सकता है कि गुटनिरपेक्ष शब्द का विभिन्न अर्थो में प्रयोग किया गया है। इस शब्द का 1945 के पश्चातवर्ती काल में प्रादुर्भाव हुआ, पश्चिमी देशों में अक्सर तटस्थवाद शब्द का प्रयोग किया जाता रहा है ओर इन्ही दोनो शब्दो की सहायता से ही गुट निरपेक्षता को समझने की कोशिश की जाती रही है। इसका कारण संभवत यह है कि पश्चिमी देशों को केवल तटस्थता का ही अनुभव है। इसलिये वो गुटनिरपेक्षता को तटस्थता का एक प्रकार समझते रहे है। भारत ने नवोदित राष्ट्रों की स्वतंत्रता एंव विकास में सहयोग दिया। परमाणु शक्तियो।के शोषण से बचाव करने का प्रयास किया। तृतीय विश्व के देशों के लिये एक आदर्श प्रस्तुत किया। नई आर्थिक विश्व अर्थव्यवस्था के प्रयास किये। और आर्थिक विश्व व्यवस्था की स्थापना पर बल दिया। इसका प्रमुख कारण यही रहा कि जब तक इन देशों में भूख, गरीब, बेकारी व बीमारियां रहेगीं तब तक एक स्थाई व समता व न्याय पर आधारित विश्व की स्थापना नहीं की जा सकती। अतः विशेषकर 1970 के दशक से ही नई आर्थिक विश्वव्यवस्था के प्रयास आरंभ्भ हो गये थे। शीत युद्धोत्तर युग में भारत ने ही निरन्तर इसको बचाया, व यह तर्क दिया कि भारत का मानना है कि अब इस संगठन की प्राथमिकताओं को बदलने की आवश्यकता है जब तक तीसरी दुनिया की मूलभूत समस्याएंे बनी रहेगीं, इस संगठन का महत्व बना रहेगा। अतः स्पष्ट है कि भारत ने इस आंदोलन को विश्व व्यापी स्वरूप प्रदान करने में विशिष्ट कार्य किया। यह कहने में कोई अतिशयोक्ति नहंी है कि अंर्तराष्ट्रीय राजनीति को भारत की यह एक विशिष्ट देन है।
Pages : 46-50