International Journal of Advanced Education and Research

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International Journal of Advanced Education and Research
Vol. 1, Issue 4 (2016)

नव वैष्णव आन्दोलन और शंकरदेवः एक अध्ययन


जयन्त कुमार बोरो

पन्द्रहवीं (15 वीं) शताब्दी के अन्त से पहले महापुरुष शंकरदेव जी ने असम में ‘नव वैष्णव धर्म’ एवं भक्ति का प्रचार करना प्रारम्भ किया । शंकरदेव को असम में ‘नव वैष्णव धर्म’ के प्रतिष्ठापक माने जाते हैं । ‘नव वैष्णव धर्म’ बाह्मण्यवाद के विरोध में प्रतिक्रिया स्वरुप एक भक्ति आन्दोलन है, जिसे शंकरदेव जी ने तत्कालीन समय के समाज में व्याप्त विसंगतियों के विरोध में जागरण एवं धार्मिक दृष्टिकोण से प्रचार किया था । शंकरदेव कालीन समय की राजनैतिक, सामाजिक और धार्मिक वातावरण काफी असंतोष पूर्ण रहा है। समाज विखण्डित तथा बाह्मणों का वर्सस्व अधिक था । शंकरदेव ने ‘बाह्मण्यवाद’ के कठोर नियमों के विपरित एक सरल भक्ति मार्ग को चुना । जिसे जनसाधारण सरलता पूर्वक अपना सके । उनके द्वारा चलाये गये इस व्यापक धार्मिक आन्दोलन को ही ‘नव वैष्णव धर्म’ की संज्ञा से अभिहित किया जाता है । यह धर्म पूर्ववर्ती वैष्णव धर्म से प्रभावित तो था परन्तु शंकरदेव जी ने इसमें कुछ संस्कार कर आम लोगो के सम्मुख प्रस्तुत कर तथा वैष्णव भक्ति का द्वार सभी के लिए खोल दिये । उनके द्वारा चलाये गये भक्ति मार्ग में सभी प्रकार के धर्म एवं सम्प्रदायों का समावेश था । कबीर के निर्गुण भक्ति मार्ग में जिस प्रकार सभी लोगो का समान अधिकार था, ठीक वैसे ही शंकरदेव के द्वारा चलाये गये ‘नव वैष्णव धर्म’ भक्ति मार्ग में सभी प्रकार के जाति एवं समुदायों का एक समान अधिकार था । बाह्मण्य् धर्म की अपेक्षाकृत नव वैष्णव धर्म ने साधारण लोगों को अधिक प्रभावित किया । उन्होंने वैष्णव भक्ति को किसी एक वर्ग विशेष के चंगुल से निकालकर जन-जन तक पहुँचाने का प्रयास किया था । यह भक्ति मार्ग भक्ति के क्षेत्र में ‘एकेश्वरवाद’ की और ‘गुरु की महत्ता’ को स्थापित करता है । ‘नव वैष्णव धर्म’ की प्रधान विशेषता है- ‘एकेश्वरवाद’ की स्थापना करना । इस भक्तिमार्ग को ‘एक शरणनाम धर्म’ अथवा ‘ईश्वर के प्रति परम् आत्म-समर्पण करना का पक्षधर धर्म’ भी कहाँ जाता है ।
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जयन्त कुमार बोरो. नव वैष्णव आन्दोलन और शंकरदेवः एक अध्ययन. International Journal of Advanced Education and Research, Volume 1, Issue 4, 2016, Pages 33-38
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