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VOL. 2, ISSUE 3 (2017)
सांख्य दर्शन में ईश्वरवाद
Authors
डाॅ0 निवेदिता राय
Abstract
सांख्य दर्शन की गणना प्रायः निरिश्वरवादी दर्शनों में की जाती है। उपलब्ध सांख्य ग्रन्थों से भी सांख्य दर्शन का स्वरूप निरिश्वरवादी ही सिद्ध होती है।
सांख्य में जगत के उपादान या निमित्त कारण के रूप में ईश्वर की सत्ता स्वीकार नहीं की गयी है। इस दर्शन के अनुसार पुरूष और प्रकृति ही दो परम् तत्व हैं और पुरूष की सन्निधि मात्र ही प्रकृति के लिए पर्याप्त है। यद्यपि पुरूष को प्रकृति के सृष्टि कार्य का उपादान या निमित्त नहीं स्वीकार किया गया है तथापि उसकी सन्निधि सृष्टि के लिए परमावश्यक मानी गई है, जिस प्रकार दूध की प्रवृत्ति वत्स वृद्धि के लिए होती है, उसी प्रकार प्रकृति की प्रवृत्ति भी पुरूष के मोगापवर्ग के लिए होती है। मोक्ष प्राप्ति पुरूष-प्रकृति विवेक से ही सम्भव है। अतः उसके लिए भी ईश्वर की आवश्यकता सम्भव नहीं है।
उपनिषद, महाभारत, गीता, मनुस्मृति तथा पुराणों में उल्लिखित सांख्य-सिद्धान्त ईश्वरवादी ही प्रतीत होती। इन ग्रन्थों में ब्रह्म या परमात्मा को सर्वोच्च तथा नित्य बताया गया है और प्रकृति तथा पुरूष को उसके अधीन माना गया है।
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Pages:33-34
How to cite this article:
डाॅ0 निवेदिता राय "सांख्य दर्शन में ईश्वरवाद". International Journal of Advanced Education and Research, Vol 2, Issue 3, 2017, Pages 33-34
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