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VOL. 2, ISSUE 3 (2017)
बहसांस्कृतिक शिक्षा की अवधारणा एवं छात्र अध्यापकों के दृष्टिकोण का अध्ययन
Authors
शिवांगी
Abstract
बहुसांस्कृतिकता भारतीय समाज की वस्तुनिष्ठ सच्चाई है और यह बहुसांस्कृतिकता भारतीय समाज में जाति, धर्म, जीवन-शैली, मूल्यों, रीति-रिवाज, पहनावें एवं भाषाई विविधता के रूप में स्पष्ट रूप से परिलक्षित होती है। समाज में उपलब्ध इस बहुसांस्कृतिकता की छाप इसकी विभिन्न संस्थाओं में भी स्पष्ट रूप से दिखाई देती है हमारे शैक्षिक संस्थान भी इसका अपवाद नही है, आज हमें सांस्कृतिक, सामाजिक, धार्मिक व भाषाई रूप से भिन्न समूह विद्यालयों एवं कक्षाओं में दिखाई देते हैं। यह सांस्कृतिक विविधता शैक्षिक प्रक्रिया में भी महत्वपूर्ण भूमिका निभाती है क्योंकि संस्कृति व्यक्ति के ज्ञान, ज्ञान को अर्जित करने के रास्तों एवं उस ज्ञान को पाकर उसे कौन सी भूमिका निभानी है को स्पष्ट रूप से प्रभावित करती है। बहुत से विद्वान जैसे डेलपिट, बैंैक व हॅर्नानडेज शिक्षा व सासंस्कृतिक विविधता के बीच गहरा संबध देखते है एंव शिक्षा को छात्रों के परिवेश से जोडने के लिए बहुसांस्कृतिक शिक्षा को एक उपाय के रूप में सुझाते हैं। ऐसी स्थिति में भारत जैसे बहुसांस्कृतिक देश में शिक्षा व संस्कृति के संबंध को समझना बहुत अधिक महत्वपूर्ण हो जाता है क्योंकि जहाँ एक और संस्कृति पर शिक्षा का प्रभाव पडता है वहीं दूसरी और शिक्षा के माध्यम से संस्कृति को हस्तांतरित किया जाता है। शिक्षा में सांस्कृतिक विविधता के इस महत्तव को देखते हुए इस अध्ययन में बहुसांस्कृतिकता के प्रति छात्र-अध्यापकों व अध्यापिकाओं के दृष्टिकोण को जानने का प्रयास किया गया। इस अध्ययन को करने के पश्चात निश्कर्ष रूप में पाया गया कि सभी छात्र अध्यापक व अध्यापिका बहुसांस्कृतिक शिक्षा को एक संसाधन के रूप में देखते हैं न की बाधा के रूप में। हालांकि इस विचार की व्यवहारिकता को लेकर वे कुछ आशंकित हैं क्योंकि भारत जैसे जटिल विविधताओं वाले देश में बहुसांस्कृतिकता कि अवधारणा को समझना एवं इस पर कार्य करना आसान नहीं है।
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Pages:112-115
How to cite this article:
शिवांगी "बहसांस्कृतिक शिक्षा की अवधारणा एवं छात्र अध्यापकों के दृष्टिकोण का अध्ययन". International Journal of Advanced Education and Research, Vol 2, Issue 3, 2017, Pages 112-115
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