Logo
International Journal of
Advanced Education and Research

Search

ARCHIVES
VOL. 8, ISSUE 1 (2023)
बांस एवं रिंगाल हस्तशिल्प ग्रामीण आजीविका में सुधार का महत्वपूर्ण संसाधन
Authors
डॉ. विपिन कुमार सती, डॉ. दुर्गेश पन्त
Abstract
उत्तराखण्ड राज्य जैवविविधता की दृष्टि से हॉट-स्पॉट होने के कारण यहां पर पाये जाने वाले प्राकृतिक संसाधन अल्प आय वर्ग एवं ग्रामीणों की आजीविका के महत्वपूर्ण संसाधन हैं, इन्ही संसाधनों में से बांस एवं रिंगाल के संसाधन ग्रामीण काश्तकारों के आजीविका के प्रमुख स्रोत है। बांस घास की प्रजाती का एक ऐसा पौधा है जिसे इसके बहुउपयोगी गुणों के कारण इसे हरा सोना एवं च्ववत उंदष्े जपउइमत के नामों से जाना जाता है। उत्तराखण्ड राज्य की भौगोलिक स्थिति अत्यन्त विषम एवं संवेदनशील होने के कारण रोजगार के अल्प संसाधन है। बांस के संसाधनों को संरक्षण एवं काश्तकारों की क्षमता विकास के द्वारा रोजगार के अवसर प्राप्त किये जा सकते है। बांस पर्यावरण की दृष्टि से प्राकृतिक संतुलन बनाये रखने, सामुदायिक विकास एवं मानवीय आवश्यकताओं की पूर्ति के साथ-साथ आयवर्धन व रोजगार का अतिउत्तम संसाधन हो सकता है। वर्तमान समय में कोविड-19 महामारी के प्रभाव से रोजगार के अवसरों में भारी कमी आयी है इसके साथ ही पिछड़े समुदाय के काश्तकार जो इस उद्यम से जुड़े हैं उनके लिए बांस एवं रिंगाल के संसाधन रोजगार एवं आयवर्धक हेतु सहायक सिद्ध हो सकते हैं। अतः इस उद्देश्य को ध्यान में रखते हुये उत्तराखंड राज्य विज्ञान और प्रौद्योगिकी परिषद (यूकाँस्ट), द्वारा राज्य में जीवोकोपार्जन हेतु बांस एवं रिंगाल पर आधारित पारम्परिक उत्पादों के मूल्यवर्धन हेतु व काश्तकारों के सामाजिक आर्थिक उन्नयन हेतु उनकी कार्यक्षमता में विकास एवं समस्त काश्तकारों को उत्पादों की बिक्रि हेतु विभिन्न संस्थाओं के साथ जोड़ कर श्रृंखला विकास की प्रक्रिया का अध्ययन किया जा रहा हैं।
Download
Pages:89-91
How to cite this article:
डॉ. विपिन कुमार सती, डॉ. दुर्गेश पन्त "बांस एवं रिंगाल हस्तशिल्प ग्रामीण आजीविका में सुधार का महत्वपूर्ण संसाधन". International Journal of Advanced Education and Research, Vol 8, Issue 1, 2023, Pages 89-91
Download Author Certificate

Please enter the email address corresponding to this article submission to download your certificate.